पश्चिम हिमालय में पर्यावरणीय संकट – बर्फ से लेकर विकास तक, कई मोर्चों पर बढ़ता खतरा

यह लेख पश्चिम हिमालय के बहुआयामी पर्यावरणीय संकट पर केंद्रित है, जहाँ तेज़ी से बढ़ते तापमान, ग्लेशियर और बर्फ़ कवर में कमी, जल प्रवाह में अस्थिरता और बड़े विकास परियोजनाएँ मिलकर जल, कृषि और आजीविका को गहरे संकट में धकेल रही हैं। यह स्थानीय गलत नीतियों और वैश्विक ऊष्मीकरण दोनों को बदलने की जरूरत रेखांकित करता है।

पश्चिम हिमालय के बहुआयामी संकट

आज जो विषय है, वह पश्चिम हिमालय में पर्यावरणीय संकट का है। इस संकट में जलवायु परिवर्तन का संकट तो है ही, लेकिन साथ-साथ और भी कुछ संकट पिछले कुछ सालों से काफी तेजी से बढ़े हैं। इसमें कुछ स्थानीय प्रभाव हैं, और जो सरकारें – चाहे भारत सरकार हो या राज्य सरकारें – कुछ कर रही हैं, उसका भी पहलू है। साथ ही, विश्व स्तर पर जो परिवर्तन हो रहे हैं, उसका भी एक असर पश्चिम हिमालय में बहुत तेजी से देखने को मिल रहा है।

इसमें कुछ ऐसी चीजें हैं, जो मीडिया में बहुत आ चुकी हैं और जिन पर नियमित बातचीत चलती रहती है। लेकिन कुछ ऐसी चीजें भी हैं, जिन पर बातचीत बहुत कम होती है, हालाँकि उनका भी काफी गहरा असर है। यह लेख RGICS द्वारा आयोजित एक कन्वर्सेशन के ट्रांसक्रिप्शन का सम्पादित संस्करण है. इसका मूल वीडियो रिकॉर्डिंग हमारी वेबसाइट पर उपलब्ध है।

पश्चिम हिमालय की जलवैज्ञानिक विशेषता: कम बारिश, लेकिन बर्फ पर निर्भर नदियाँ

हम सब जानते हैं कि पश्चिम हिमालय में प्रेसिपिटेशन – यानी बारिश हो, बर्फ हो, पानी का किसी न किसी रूप में गिरना – मध्य हिमालय और पूर्वी हिमालय की तुलना में काफी कम है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, पश्चिम हिमालय से बहुत बड़ी-बड़ी नदियाँ निकलती हैं। यहाँ से न केवल मध्य भाग और पूर्व की तुलना में नदियाँ निकलती हैं, बल्कि जो सबसे बड़ी नदियाँ निकलती हैं, वे पश्चिम हिमालय से ही निकलती हैं – जिसमें ट्रांस हिमालय भी शामिल है।

इन नदियों (जैसे इंडस, ब्रह्मपुत्र, और ब्यास, जो इंडस की सहायक नदी हैं) का एक कैरेक्टरिस्टिक्स है जो उन्हें मध्य और पूर्वी हिमालय से निकलने वाली नदियों से बिल्कुल अलग बनाता है। दरअसल, इन नदियों में जो पानी आता है, उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा स्नो एंड आइस मेल्ट होता है। मतलब जो ग्लेशियर है, बाकी बर्फ है, जो पिघलने से पानी आता है, वह इन नदियों के लिए बहुत बड़ा स्रोत है। जबकि, आप मध्य हिमालय और पूर्वी हिमालय को देखें, तो वहाँ बारिश का पानी, और जो जंगल और मिट्टी उस पानी को पकड़ के रखते हैं, उससे सालभर पानी आता रहता है। यह दोनों के बीच एक बहुत बड़ा अंतर है। अब जलवायु परिवर्तन का और पर्यावरणीय परिवर्तन का जो प्रभाव पड़ रहा है, वो इसी अंतर से काफी जुड़ा हुआ है, क्योंकि बारिश, बर्फ और बर्फ पिघलने का योगदान यहाँ बहुत महत्वपूर्ण है।

हिमालय मे बढ़ते तापमान का संकट

हिमालय को ‘थर्ड पोल’ भी बोला जाता है – जिसमें ट्रांस हिमालय भी शामिल है, क्योंकि सबसे बड़ा बर्फ का हिस्सा तिब्बत के हिस्से और ट्रांस हिमालय में ही है। जब हम हिमालय बोलते हैं, तो ट्रांस हिमालय उसके अंदर आ जाता है। यह थर्ड पोल पृथ्वी पर सबसे ज्यादा फ्रेश वाटर का स्रोत है। लेकिन पिछले करीब तीन दशक से तापमान में जो बढ़ोतरी हो रही है, वह यहाँ काफी तेजी से देखी जा रही है।

तुलना करें तो: 1902 से 2018 तक, पूरे भारत के मुख्य भूभाग (प्रायद्वीपीय भारत और मैनलैंड) में तापमान 0.72 से 0.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। दरअसल, भारत के लैंड मास पर तापमान की वृद्धि पूरी दुनिया के औसत तापमान की वृद्धि से थोड़ी कम ही हुई है (उसके कारण भी हैं – तीनों तरफ समुद्र होने से वो मॉडरेट हो जाता है)। लेकिन उत्तर भारत में – यानी लोअर हिमालय बेल्ट, शिवालिक के ऊपर के एरिया में – तापमान की वृद्धि काफी तेजी से हुई है।

इसका एक बहुत बड़ा कारण है एम्पलीफाइड फीडबैक इफेक्ट (Amplified Feedback Effect) या जिसे हम आम भाषा में ‘विशियस साइकिल’ भी बोल सकते हैं। साइंटिफिक भाषा में इसे पॉजिटिव एम्पलीफाइंग फीडबैक कहते हैं – यानी कारण, इफेक्ट को बढ़ा रहा है, और इफेक्ट, कारण को बढ़ा रहा है।

यह कैसे होता है? जब सूरज की किरण गिर रही है, गर्मी बढ़ रही है। उस गर्मी से बर्फ पिघल रही है। और जब बर्फ पिघलती है, तो नीचे का पत्थर या मिट्टी एक्सपोज़ हो जाती है। बर्फ का रिफ्लेक्टिविटी (जिसे अलबीडो कहते हैं) बहुत ज्यादा होता है – ताजी बर्फ 90 प्रतिशत से ऊपर सूरज की गर्मी को वापस परावर्तित कर देती है। जबकि, नीचे के पत्थर, मिट्टी, घास, या हरियाली का अलबीडो काफी कम होता है। हरी वनस्पति (फोटोसिंथेटिक ग्रीन) का अलबीडो 0.15 से 0.17 के आसपास होता है – यानी सिर्फ 15-17% गर्मी परावर्तित होती है, बाकी अब्जॉर्ब होती है। और मिट्टी और पत्थर का अलबीडो 0.1 से 0.15 के बीच होता है – यानी सिर्फ 10-15% गर्मी परावर्तित करते हैं, बाकी अब्जॉर्ब कर लेते हैं।

जैसे-जैसे बर्फ पिघलती है और नीचे की मिट्टी-पत्थर एक्सपोज़ होती है (जो पिछले तीन दशक से काफी तेजी से हो रहा है), वैसे-वैसे ज़मीन अधिक गर्मी पकड़ने लगती है। अधिक गर्मी का मतलब है और अधिक बर्फ पिघलना, और अधिक बर्फ पिघलने का मतलब है और भी अधिक गर्मी अब्जॉर्ब होना। यह एक खतरनाक स्थिति है, क्योंकि एक स्टेज के बाद इस चक्र को रोकना मुश्किल हो जाता है। फिलहाल हिमालय क्षेत्र उस स्टेज पर नहीं पहुंचा है, लेकिन उस दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।

तेजी के घटते ग्लेशियरों का संकट

पश्चिम हिमालय में, जैसा कि मैंने बोला, बर्फ पिघलने का पानी ही नदियों का प्रमुख हिस्सा है, और नीचे की पूरी सभ्यता, मानव बस्तियाँ, नगर, गाँव और वनस्पतियाँ सब इसी पानी पर निर्भर हैं। यहाँ बर्फ का आवरण बहुत तेजी से कम हो रहा है।

इसरो के स्पेस एप्लिकेशन सेंटर (अहमदाबाद) का कुछ साल पहले एक अध्ययन था, जिसमें भारत में करीब 864 ग्लेशियरों का अध्ययन किया गया था। सैटेलाइट मेज़रमेंट शुरू होने के बाद से पिछले करीब 20-40 सालों में जो माप लिए गए हैं, उनसे पता चलता है कि पिछले 40 सालों में करीब 22 से 25 प्रतिशत बर्फ का कवर खत्म हो चुका है – यानी irreversibly (अपरिवर्तनीय रूप से) वह पीछे हट गया है। यह सिर्फ ग्लेशियर ही नहीं है, बल्कि जितना भी स्नो-आइस कवर था, वह पीछे हट रहा है।

न्यूज़ में आता है कि ग्लेशियर पीछे हट रहा है, लेकिन असली खतरा यह है कि एक बार बर्फ पिघलने के बाद, नीचे डार्कर कलर की मिट्टी और पत्थर एक्सपोज़ हो जाते हैं। ये इतनी गर्मी पकड़ लेते हैं कि फिर से उस एरिया में स्नो-आइस कवर का जमा होना मुश्किल हो जाता है। उस पूरे एरिया में गर्मी का एक माहौल बन जाता है (एक डोम टाइप सा), जिसके चलते जो नई प्रेसिपिटेशन होती है, वह बर्फ के रूप में नहीं गिर पाती, बल्कि बारिश के रूप में गिरती है।

यह पश्चिम हिमालय के लिए बहुत बड़ा खतरा है। क्योंकि यहाँ एक बहुत बड़ा एरिया डेजर्ट है – जिसे कोल्ड डेजर्ट कहते हैं। लद्दाख का बहुत बड़ा हिस्सा कोल्ड डेजर्ट है, स्पीती भी कोल्ड डेजर्ट है। यहाँ अगर पानी बारिश के रूप में गिरता है, तो वह बहुत जल्दी मिट्टी के नीचे गहरे चला जाता है। जबकि अगर वही पानी बर्फ के रूप में गिरता, तो वह धीरे-धीरे कॉम्पैक्ट होकर बर्फ बनता, और लॉन्ग-टर्म स्टोरेज में चला जाता। लेकिन पूरे एरिया में गर्मी का माहौल (हीट रिटेंशन) बढ़ रहा है, जिससे बर्फ के रूप में गिरने वाली बूंदें नीचे आते-आते पानी में बदल रही हैं। यह पश्चिम हिमालय के लॉन्ग-टर्म वाटर स्टोरेज का एक बहुत बड़ा संकट है।

बड़े विकास परियोजनाओं और संरचनाओं के प्रभाव का संकट

अब एक और चीज़ चल रही है, जो इस संकट का पूरक (सप्लीमेंट) है और इसे और बढ़ा रही है – वह है डेवलपमेंटल इम्पैक्ट। पिछले कुछ सालों में, आपने देखा होगा कि बहुत बड़े स्तर पर चौड़े फोर लेन हाईवे बन रहे हैं। जम्मू से श्रीनगर फोरलेन हाईवे में पूरी ग्रीननेस खत्म करके एक बैरेन (बंजर) वेस्टलैंड बना दिया गया है। जैसे ही पहाड़ों में बहुत बड़ा और चौड़ा ब्लैक टॉप सर्फेस रोड बनता है, समस्या पैदा होती है।

यहाँ समझना जरूरी है – काला रंग सबसे अच्छा हीट अब्जॉर्वर होता है। पहले पेड़-पौधों का एक कवर था, जो दो काम करता था – एक, गर्मी को जमीन पर आने से रोकना, और दूसरा, भारी बारिश के समय लैंडस्लाइड को रोकना। अब यह कवर बहुत बड़े स्तर पर कट चुका है। अनुमान के मुताबिक, जम्मू-श्रीनगर फोरलेन हाईवे बनाने में करीब 13-17 लाख पेड़ कट चुके हैं। किसी ने सटीक गिनती नहीं की है, लेकिन मोटा अनुमान यही है।

इसका परिणाम है कि पश्चिम हिमालय में जहाँ कभी ‘अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट’ की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, वहाँ अब वह इफेक्ट शुरू हो गया है। एक के बाद एक फोरलेन सड़कें बनने से, और खुली चट्टानों, कंक्रीट और ब्लैक टॉप रोड के कारण, स्थानीय तापमान और बढ़ रहा है।

तेजी से बढ़ते डीजल वाहनों से ब्लैक कार्बन एरोसोल्स का संकट

तीसरा बड़ा संकट, जो यहाँ दिख रहा है, उसका कारण है डीजल वाहनों और उपकरणों से निकलने वाला पार्टिकुलेट उत्सर्जन। पूरे पहाड़ में, सूक्ष्म कणों का जो प्रदूषण है, वह बहुत तेजी से बढ़ा है। इसके मल्टीपल इफेक्ट हैं, ।

समान क्षमता वाली डीजल गाड़ी, पेट्रोल गाड़ी से 6 से 7 गुना ज्यादा पार्टिकुलेट एमिशन करती है। मान लीजिए 1200 सीसी पेट्रोल इंजन और 1200 सीसी डीजल इंजन – तो डीजल इंजन का पार्टिकुलेट एमिशन 6-7 गुना अधिक होता है (हालाँकि डीजल इंजन की एनर्जी एफिशिएंसी थोड़ी अधिक होती है, लेकिन कम्बशन साइकिल अलग होने के कारण पार्टिकुलेट बहुत ज्यादा निकलता है)। यह पार्टिकुलेट सिर्फ धूल नहीं है – यह केमिकल लैडन होता है। इसमें बहुत सारे सूट (unburnt hydrocarbons), सेकेंडरी टर्शियरी पार्टिकल्स, और सल्फर पार्टिकल्स होते हैं जो सेहत के लिए बहुत नुकसानदायक हैं।

इसके दो असर हैं:

  1. स्वास्थ्य पर प्रभाव: जहाँ पहले बिल्कुल प्रिस्टीन एयर (बिल्कुल साफ हवा) मिलती थी, अब शिमला, सोलन, लेह के केंद्रीय एरिया (जहाँ गाड़ियाँ चलती हैं) में भी वायु प्रदूषण में सिग्निफिकेंट इनक्रीज हुई है।
  2. बर्फ पिघलने पर प्रभाव: ये कण – जिन्हें ब्लैक कार्बन एरोसोल्स कहते हैं – कुछ दिन वातावरण में तैरते रहते हैं, और फिर बर्फ के ऊपर डिपॉजिट (जमा) हो जाते हैं। जब साफ बर्फ पर यह काला कण जमता है, तो बर्फ की रिफ्लेक्टिविटी कम हो जाती है। पहले साफ बर्फ 90% से अधिक गर्मी वापस अंतरिक्ष भेज देती थी (जैसे आईना)। अब काले पार्टिकल्स के कारण वह बर्फ अधिक गर्मी अब्जॉर्ब करने लगती है, और बहुत तेजी से पिघलती है। यानी ब्लैक कार्बन एरोसोल्स बर्फ पिघलने में भारी मददगार हैं।

ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड और क्षेत्र मई पानी का संकट

पिछले कुछ सालों से GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) का खतरा बहुत बढ़ चुका है, और एक के बाद एक ऐसी घटनाएँ हो भी रही हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारे सामने 2013 का केदारनाथ के ऊपर चूराबारी झील में हुआ था। और पिछले 2023 में सिक्किम में साउथ लोनार झील में जो हुआ, वो भी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड ही था।

कैसे होता है? ऊपर ग्लेशियर से बर्फ पिघलकर पानी आता है। पत्थर-मिट्टी का एक मोरेन डैम बन जाता है, जो उस पानी को रोक लेता है, और एक झील बन जाती है। लेकिन जब बहुत तेजी से उसमें पानी आता है (जैसा कि आजकल ग्लोबल वार्मिंग/हीटिंग और ब्लैक कार्बन डिपोजिशन के कारण हो रहा है – खासकर अप्रैल-मई में), तो उस झील का साइज बढ़ता है, उसकी गहराई बढ़ती है। गहराई बढ़ने का मतलब है कि मोरेन रिटेनिंग वॉल (डैम) पर प्रेशर बढ़ जाता है। जैसे ही रिटेंशन कैपेसिटी से थोड़ा भी अधिक होता है, वह डैम कोलैप्स कर जाता है, और भीषण बाढ़ आती है। यह खतरा तेजी से बढ़ रहा है – ग्लेशियल झीलों की संख्या बढ़ रही है, उनका साइज़ बढ़ रहा है, और वे फट रही हैं।

जैसे ही शुरुआती गर्मियों का पीरियड खत्म होता है, बर्फ का जो स्टोर था, वह बहुत कम हो जाता है (खत्म नहीं, लेकिन बहुत कम हो जाता है)। इसके चलते, गर्मियों में नदियों का प्रवाह (रिवर फ्लो) बहुत तेजी से कम हो रहा है। अब यह बड़ी विडंबना है कि जिस पीरियड में खेती का समय है (बुआई का पीरियड), उसी पीरियड में नदी से पानी आने का परिमाण बहुत कम हो रहा है।

परिणाम यह है – शुरुआती गर्मियों में, जब आप तैयार नहीं होते, फ्लडिंग हो रही है। जैसे ही खेती का टाइम आता है, जब पानी की पर्याप्त सप्लाई चाहिए, तब पानी कम हो रहा है। देर से गर्मियों में तो पानी पूरी तरह कम हो रहा है। मानसून में भी समस्या है, क्योंकि पश्चिम हिमालय के ऊपरी हिस्से में मानसून बहुत कम पहुंचता है – वहाँ प्रेसिपिटेशन पहले से ही कम है। मेजर कॉन्ट्रीब्यूशन था स्नो का। अब वह स्नो पिघलकर बारिश बन रहा है, तो शॉर्ट-टर्म फ्लो तो मानसून में मिल जाता है, लेकिन पोस्ट-मानसून का पीरियड बहुत सूखा जा रहा है।

गलत धारणा और गलत समाधान – हाई-अल्टीट्यूड में कृत्रिम हरियाली

अंतिम बिंदु के तौर पर मैं इस पर हाइलाइट करना चाहूंगा, जो वैज्ञानिक समझ के अनुसार प्रतिक्रिया करने के बजाय एक गलत धारणा पर आधारित है। मैं लद्दाख में 2000 से काफी बार गया हूं। वहाँ, बहुत ऊँची अल्टीट्यूड पर, स्नोलाइन के नजदीक, लोगों ने पानी का इस्तेमाल करके (जो छोटे स्नो मेल्ट वाटर के स्ट्रीम हैं) काफी ग्रीनरी बना ली है। अब, ग्रीनरी बनाना सभी को अच्छा लगता है, क्योंकि हमारे समाज में एक गलत धारणा है कि पेड़ लगाने से सबकुछ ठीक हो जाएगा। यह बिल्कुल गलत धारणा है, खासकर हाई-अल्टीट्यूड, कोल्ड डेजर्ट एरिया में।

यहाँ मूल रूप से रिफ्लेक्टिविटी (अलबीडो) काफी हाई थी। इसीलिए वह कोल्ड डेजर्ट बना हुआ था। लेकिन अगर आप वहाँ कृत्रिम रूप से स्थानीय हरियाली बनाएँगे, तो दो कारणों से हीट रिटेंशन काफी ज्यादा हो जाएगा: (1.)  हरे पत्तों का अलबीडो कम होता है (15-17%), यानी वे अधिक गर्मी अब्जॉर्ब करते हैं। (2.)  इन पेड़-पौधों से इवापोट्रांस्पिरेशन होता है, जो मिट्टी से पानी लेकर वाष्पित करता है। इससे ऊपर एक लोकल मॉइस्चर लेयर बनती है। और जलवाष्प (वाटर वेपर) एक बहुत अच्छी ग्रीनहाउस गैस है।

इन दोनों प्रभावों के कारण, स्थानीय तौर पर एक छोटा हीट आइलैंड बन जाता है, वहाँ पहले जो स्नोलाइन थी, वह और ऊपर खिसक जाती है। इस प्रकार, अनजाने में हम उन इलाकों में जहाँ सर्दी और पूर्व-सर्दी में सालभर बर्फ रहा करती थी, अब हीट आइलैंड बना रहे हैं।

हिमालय मे क्लाइमेट चेंज और आर्थिक संकट

हालाँकि पश्चिम हिमालय में पर्यावरणीय संकट की बातचीत अक्सर ग्लेशियर और बाढ़ तक सीमित रहती है, लेकिन इसका सबसे क्रूर और मूक परिणाम पहाड़ों की मानवीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढाँचे पर पड़ रहा है। यह संकट अब सिर्फ पर्यावरणीय नहीं, बल्कि अस्तित्व का संकट बन चुका है।

इसके चलते जो आउट-माइग्रेशन (बाहर की ओर पलायन) पहाड़ों में हुआ है, वह चिंताजनक है। उत्तराखंड में बहुत सारे ‘घोस्ट विलेज’ (प्रेत गाँव) हो चुके हैं – जहाँ सिर्फ दो-चार बुजुर्ग लोग पड़े हैं, बाकी कोई नहीं है। हिमाचल में यह थोड़ा कम है, लेकिन उत्तराखंड में तो कुछ अनुमानों के अनुसार 400-500 से अधिक ऐसे गाँव हैं, जहाँ अधिकतर घरों में ताला लगा रहता है। यह पलायन कई कारणों से हुआ है, लेकिन जलवायु से जुड़ा एक कारण बहुत महत्वपूर्ण है।

पहले जितनी पैदावार होती थी, अब वह नहीं होती है। फसल के पकने का जो पारंपरिक समय (हार्वेस्ट टाइम) आता था, उसी समय अचानक कोई चरम मौसमी घटना (क्लाइमेट एक्सट्रीम इवेंट) हो रही है। उससे फसल बर्बाद हो रही है। लेकिन इससे भी बड़ी समस्या है – जंगली जानवरों का बढ़ता हमला।

एक उदाहरण देखिए। उत्तरकाशी से ठीक पहले, ‘मातलि’ गाँव के पीछे जो दो-तीन गाँव हैं, वहाँ एक महिला किसान – जो पूरे गाँव की सबसे अच्छी किसान मानी जाती थी – उन्होंने स्थिति साफ समझाई। पूरे गाँव की ज़मीन खाली पड़ी हुई है। पूछने पर उन्होंने बताया, करें तो क्या करें? जब भी फसल पकने का समय होता है, तब जंगली सूअर आ जाते हैं, बंदर आ जाते हैं। खा कर पूरी फसल खराब कर देते हैं। जितना हम लगाते हैं, उतना भी हाथ नहीं लगता। इसलिए हमने खेती छोड़ दी और मजदूरी करने चले गए।

यह जलवायु परिवर्तन का ही एक बड़ा परिणाम है। जंगल का एरिया – वाइल्डरनेस एरिया – जहाँ ये जानवर रहते थे, वहाँ पानी कम हो गया है, उनके खाने (प्राकृतिक भोजन) की कमी हो गई है। नतीजतन, वाइल्डरनेस एरिया छोटा पड़ रहा है और फ्रेग्मेंटेड हो रहा है। वहाँ का जीव-जंतु – चाहे हाथी हो, बंदर हो, सूअर हो, परकोपाइन (साही) हो या मोर – अपनी मौत से पहले आखिरी कोशिश खाने के लिए करेगा ही। और जब वह बाहर आता है, तो खेती को तहस-नहस कर देता है।

यह संकट केवल उत्तराखंड या पश्चिम हिमालय तक सीमित नहीं है। यही स्थिति पूरे केरल में हो रही है, कर्नाटक में पश्चिमी घाट के हिस्से में हो रही है, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भी हो रही है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि किसान इन जानवरों को दोष दे रहे हैं। लेकिन दोष जानवर का नहीं है। हमने ही उनके लिए न तो वाइल्डरनेस छोड़ा, न जंगली एरिया में उनके लिए खाने-पीने का प्रबंध छोड़ा। जिन किसानों ने लोन लेकर खेती की थी, वे तो बिल्कुल चूर हो गए। यह संकट – जहाँ एक तरफ जलवायु परिवर्तन सीधे फसल को नष्ट कर रहा है, दूसरी तरफ वन्य जीवों के आवास को नष्ट करके उन्हें इंसानी खेती पर निर्भर कर रहा है – बहुत गहरा और तेजी से बढ़ता जा रहा है।

निष्कर्ष: वैश्विक समाधान के साथ-साथ स्थानीय गलतियों को सुधारना

मेरे ख्याल से, इस संकट का कुछ हल हम निकाल सकते हैं। जो ग्लोबल हीटिंग चल रहा है, उसका हल तब तक नहीं है, जब तक कोई वैश्विक समाधान नहीं निकलता। लेकिन जो गलत धारणाएँ और गलत काम हम स्थानीय स्तर पर कर रहे हैं – जैसे कि उच्च अल्टीट्यूड पर बड़े पैमाने पर काले डामर और कंक्रीट की सतहों (सड़कों और कंक्रीट इंफ्रास्ट्रक्चर) को एक्सपोज़ करना – उन्हें हम रोक सकते हैं। यही वे कारण हैं, जो आज पश्चिम हिमालय में कई जगहों पर लोकल हीट आइलैंड बना रहे हैं।

(This article is based on a conversation with Mr. Saumya Dutta, organized by RGICS. The audio was transcribed by Mr. Apurva Kumar and article edited by Dr. Jeet Singh. For full video please go through- https://www.youtube.com/watch?v=BMxHxm6vbEc )

Photo by Akshat Jhingran on Unsplash

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